कैसे होगा ज़िले के एक एक इंच ज़मीन के टुकड़े का हिसाब साहब! पहले शहर में हो रहे अतिक्रमण को तो रोकिए, पहले उन्हें तो हटाओ जो करोड़ों की सरकारी जगहों पर कुण्डली मारे बैठे है.


सांकेतिक चित्र 

क्या ज़मीन मालिक को सिर्फ़ ऐप में ही दिखेगी ज़मीन

शहर के बहुत से इलाक़ों में सरकारी और निजी जमिनो में चल रहा है अतिक्रमण का खेल प्रशासन मौन क्यू

द भारत लाइव। कबीरधाम ज़िले में नजूल एवं निजी भूमि के नक़्शा खसरा के संधारण दुरुस्त करने और डिजिटल रूप से तैयार करने के लिए नवपदस्थ कलेक्टर श्री रमेश कुमार शर्मा ने ज़िले के आला अधिकारी के साथ बैठक कर मोबाइल ऐप्लिकेशन तैयार करवाने की बात की है.

परंतु सत्यता तो यह है की नजूल और निजी भूमि को लेकर ज़िले के कई गाँव के साथ साथ शहर में अतिक्रमण इतना अधिक हो चुका है के अब कान सी जगह नजूल है और कौन सी जगह निजी है यह पता लगाने में छः माह तो क्या दस वर्ष भी कम पड़ जाएँगे।


आपको बता दे के शहर में तो इस तरह की घटना आम हो चुकी है कवर्धा शहर के आधे से ज़्यादा आबादी वाले जगह नजूल भूमि है जिन पर अवैध रूप से अतिक्रमण करियों का क़ब्ज़ा है जिस पर आज एक नहि दो दो मंज़िला इमारतें टिकी हुई है. जिस पर आज पर्यन तक कार्यवाही शून्य है प्रशासन का यह मौन रवैया समझ से परे है. आज भी आप शहर के कई इलाक़े में घुम ले आपको एक दो अवैध क़ब्ज़ा होते दिख जाएगा. शासन की करोड़ों की जमिनो पर साँप की तरह कुण्डली मार के बैठने वाले आराम से बेख़ौफ़ घूम रहे है.

पहले भूमि पर अतिक्रमण करना फिर घर बनाकर मोटी रक़म में बेचना यह तो कवर्धा शहर में आम हो चुका है प्रशासन की कार्यवाही न करने से अतिक्रमण करने वालों के हौसले और भी बुलंद होते जा रहे है.

जल्द ही इस पर कार्यवाही करने की है आवश्यकता अगर समय रहते नहि किया गया तो शहर को इनसे बचाना और सही तरीक़े से नक़्शों खसरों का संधारण तो आप भूल ही जाइए शासन को या आम जन को सिर्फ़ एप में ही भूमि दिखेगी वास्तव में नही।

हर तीस साल में करना होता है नक़्शों का बंदोबस्त मगर प्रशासन की उदासीनता के चलते यह भी नहि हो पाया आख़िरी बार देश के आज़ादी के पूर्व सन 1927-28 में किया गया है. वर्तमान में कई गाँव और शहर के कई इलाक़े भू अभिलेख मानचित्र में ही नही है.

शहर को अगर 1927-28 नक़्शे पर देखा जाए तो आधा शहर अतिक्रमित है. इस नक़्शे का उपयोग कवर्धा के पूर्व कलेक्टर श्री अमित कटारिया जो की वर्तमान में केंद्र में अपनी सेवाए दे रहे है, ने शहर सौंदरयिकरण वर्ष 2007-08 के समय किया था और कई अतिक्रमण को हटाया था.

बहर हाल ज़िले के प्रमुख के साथ साथ आला अधिकारीयों और नगर पालिका को बैठक करके नही बल्कि ज़मीन पर उतर कर काम करने की ज़रूरत है रही बात डिजिटल करने तो ताजमहल तो काग़ज़ में भी बन जाते है.

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